मुस्लिम दुश्मन मीडिया के मुंह पर बाम्बे हाई कोर्ट का करारा तमाचा-तब्लीगी जमात का कोई हाथ नहीं

मुंबई! बाम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने कोरोना को तब्लीगी जमात से जोड़ कर प्रोपगण्डा करके देश के मुसलमानों को बदनाम करने वाले टीवी चैनलों के मुंह पर एक जोरदार तमाचा बल्कि जूता जैसा मारते हुए कहा है कि कोरोना फैलाने में तब्लीगी जमात का कोई हाथ नहीं था, चूंकि मरकजी सरकार के शहरियत तरमीमी बिल (सीएए) के खिलाफ मुल्क में बड़े पैमाने पर मुजाहिरे हो रहे थे मुजाहिरीन में मुसलमानों की तादाद सबसे ज्यादा थी इसलिए मुसलमानों को बदनाम करने की गरज से तब्लीगी जमात पर कोरोना वायरस फैलाने का इल्जाम लगा कर सभी चैनलों ने बढ-चढ कर खबरों के नाम पर प्रोपगण्डा किया। जहां तक विदेशी तब्लीगियों का सवाल है इन्हें तो बलि का बकरा बनाया गया है। जस्टिस टीवी नलवाडे और जस्टिस एमजी सिवलीकर ने अपने फैसले में कहा कि विदेशों से आए तब्लीगी जमाती बाकायदा वीजा लेकर आए थे दो-तीन दिल्ली के मरकज में ठहरने के बाद वह महाराष्ट्र के अहमदाबाद जिले में आए इस दरम्यान लाकडाउन हो गया तमाम होटल और गेस्ट हाउस बंद हो गए तो मकामी मसाजिद के जिम्मेदारान ने उन्हें मस्जिदों में रहने की जगह दे दी। मीडिया प्रोपगण्डे और कई दीगर दबाव में आकर पुलिस ने उनतीस (29) विदेशी और छः मस्जिदों के जिम्मेदारान के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करके उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। यह पूरी तरह ज्यादती और गैरकानूनी कार्रवाई थी इसलिए अदालत पुलिस रिपोर्ट को रद्द करते हुए गिरफ्तार किए गए सभी पैतीसों विदेशी और मराठी मुसलमानों को फौरन रिहा करने का आर्डर देती है। इस फैसले के बाद रिहा हुए विदेशी तब्लीगी अपने-अपने मुल्क रवाना हो गए। बाम्बे हाई कोर्ट से पहले मद्रास हाई कोर्ट भी एक फैसले में विदेशी तब्लीगियों को रिहा करने का आर्डर दे चुका है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, बहराइच समेत दीगर कई शहरों में गिरफ्तार किए गए विदेशी तब्लीगियों की रिहाई हो चुकी है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि तब्लीगी जमातियों के साथ जो कुछ किया गया वह दरअस्ल शहरियत तरमीमी कानून (सीएए) की मुखालिफत करने की वजह.

बाम्बे हाई कोर्ट के फैसले और मीडिया के खिलाफ सख्ततरीन कमेण्ट्स के बावजूद  देश में फिरकापरस्ती का जहर फैलाने वाले बेईमान बिके हुए चैनलों और उनके बदजुबान, बदतमीज व मुसलमानों के लिए गाली गलौज की जुबान (भाषा) का इस्तेमाल करने वाले ऐंकरों व ऐंकरनियों को इतनी भी शर्म नहीं आई कि वह हाई कोर्ट के फैसले पर कोई प्रोग्राम करते और अपने गुनाहों के लिए माफी मांगते। अदालत ने कहा कि ऐसा लगता है कि प्रदेश सरकार ने सियासी दबाव और मजबूरी में देशी और विदेशी मुसलमानों के खिलाफ कार्रवाई की। पुलिस में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह संविद्दान से मिले अख्तियारात का इस्तेमाल करते हुए सरकारी दबाव में अंद्दे होकर काम करने से इंकार कर देती और मुल्क को शर्मिंदा करने वाली कार्रवाइयां न करती। पुलिस ने बस मशीन की तरह काम किया और अपनी अक्ल का इस्तेमाल किए बगैर ठोस सबूतों के चार्जशीट भी अदालत में पेश कर दी जो गौर करने लायक भी नहीं है।अदालत ने अपने फैसले में कहा कि तब्लीगी जमातियों के साथ जो कुछ किया गया वह दरअस्ल शहरियत तरमीमी कानून (सीएए) की मुखालिफत करने की वजह से मुसलमानों के लिए एक डायरेक्ट वार्निंग है। दोनों फाजिल जजों ने कहा कि देश में जब भी कोई वबा (महामारी) या कुदरती आफत आती है तो सरकारें कुछ बलि के बकरे तलाश कर लेती हैं। तब्लीगी भी कोरोना के दौर में बलि के बकरे बनाए गए हैं। पुलिस इन लोगों पर इपिडेमिक एक्ट, गाइडलाइन और वीजा जवाबित (नियमों) की खिलाफवर्जी और छः भारतियों पर इन सभी को पनाह देने के जो इल्जामात लगाए वह गलत और बेबुनियाद हैं।

मीडिया ने इंतेहाई गैर जिम्मेदारी से काम करते हुए यह साबित करने की हरकतें कीं कि जैसे देश में तब्लीगी जमात के लोगों ने ही कोविड-19 फैलाया हो।

दो फाजिल जजों की बेंच ने कहा कि जो विदेशी तब्लीगी मस्जिदों में रूके उन्होने ऐसा कोई काम नहीं किया जो देश के कानून के खिलाफ हों, उन्हें तो यहां की जबान भी नहीं आती उन्होने किसी का मजहब तब्दील कराने जैसी भी कोई कार्रवाई नहीं की इसके बावजूद उनके खिलाफ बड़े पैमाने पर मीडिया ने गैरजरूरी और बदनाम करने वाला प्रोपगण्डा किया मीडिया ने इंतेहाई गैर जिम्मेदारी से काम करते हुए बार-बार यह साबित करने की हरकतें कीं कि जैसे देश में तब्लीगी जमात के लोगों ने ही कोविड-19 फैलाया हो।अदालत ने सरकार पर सख्त चोट करते हुए लिखा कि अफसरान को अपनी जानिबदाराना (पक्षपातपूर्ण) कार्रवाइयों के लिए पशेमानी और नदामत (पश्चाताप) जाहिर करना चाहिए। यह कार्रवाइयां हिन्दुस्तानी मुसलमानों को यह एहसास दिलाने के लिए की गई कि दूसरे मजहब के लोग जो कुछ करेंगे अगर मुसलमानों ने भी वैसा ही करने की कोशिश की तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। अगर उन्होने दूसरे मजहब मानने वालों की तरह विदेशी मुसलमानों के साथ कोई राब्ता (संपर्क) रखा तो उनके खिलाफ इसी किस्म की सख्त कार्रवाई की जाएगी।
अहमदनगर में गिरफ्तार विदेशी तब्लीगियों में ईरान, आइवरी कोस्ट, इंडोनेशिया और डिजिबोती जैसे मुल्कों के शहरी हैं वह सभी कानूनी तौर पर वीजा लेकर दिल्ली आए वह यहां की सकाफत (संस्कृति) और समाज को जानने के मकसद से आए थे तब्लीग के जरिए हर शख्स को बेहतर इंसान बनाने की कोशिशें की जाती हैं। तब्लीगी जमात किसी दूसरे मजहब के लोगों का मजहब तब्दील कराने का काम भी नहीं करते हैं। उनकी पैरवी करने वाले मजहर जहांगीरदार एडवोकेट ने अदालत को बताया कि वह भारत की सकाफत (सस्कृति), तहजीब, रिवायात यहां की मेहमाननवाजी और खान-पान की मालूमात हासिल करने आए थे लेकिन सरकार ने उन्हें जेल की मालूमात करा दी ताकि वह अपने मुल्क में वापस जाकर बता सकें कि भारत में किस किस्म की मेहमाननवाजी होती है।

मस्जिदों में अगर हमने इन्हें मस्जिदों में रहने की जगह दे दी तो कौन सा गुनाह कर दिया।

फर्जी मुकदमों में फंसाए गए विदेशी तब्लीगियों ने अदालत को बताया कि वह लोग साल के शुरू में फरवरी में या दस मार्च से पहले आ गए थे एयरपोर्ट पर उनकी स्क्रीनिंग करके अफसरान ने यह पता कर लिया कि उनमें से कोई कोरोना मरीज तो नहीं है। हर तरह की चेकिंग के बाद ही उन्हें भारत के अंदर दाखिल होने की इजाजत मिली थी। जब वह भारत आए थे उस वक्त तो लाकडाउन भी नहीं था। अदालत के सख्त रूख के बावजूद मुंबई पुलिस के वकील ने यही कहने की कोशिश की कि तब्लीगियों ने लाकडाउन की खिलाफ गए और जब यह एलान किया गया कि जो लोग मसाजिद में हों वह बाहर आकर अपना टेस्ट करा लें तब भी यह लोग सामने नहीं आए। जिन छः मसाजिद के जिम्मेदारों को गिरफ्तार किया गया था उन्होने अदालत से कहा कि लाकडाउन होने की वजह से तमाम सवारियां रेले और फ्लाइट्स के साथ-साथ होटल और गेस्टहाउस बंद हो गए थे यह लोग यहां फंसे थे हमारे सामने दो ही रास्ते थे या इन्हें हम अपने घरों में रखते या मस्जिदों में अगर हमने इन्हें मस्जिदों में रहने की जगह दे दी तो कौन सा गुनाह कर दिया। अदालत ने उनकी तारीफ करते हुए कहा कि आप लोगों ने कोई गुनाह नहीं किया आपने तो विदेशी मेहमानों को ठहरा कर देश की मेहमान नवाजी का सबूत दिया है।अदालत ने कहा कि तब्लीगी जमात पचास सालों से भी ज्यादा वक्त से इज्तिमा करती रही हैं कभी जमात ने न तो नफरत फैलाई और न ही किसी का मजहब तब्दील कराया। अगर मस्जिदों ने उन्हें पनाह दी तो इसमें कानून तोड़ने जैसा कौन सा जुर्म हो गया। अदालत ने कहा कि लाकडाउन के दौरान गुरूद्वारों ने भी फंसे हुए लोगों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए थे। अदालत ने कहा कि अफसरान और पुलिस ने यह नहीं कहा है कि लाकडाउन के दौरान मस्जिदों के दरवाजे आम लोगों और नमाजियों के लिए खोले जो सरकारी आर्डर्स की खिलाफवर्जी होती।

तब्लीगियों और मस्जिदों के जिम्मेदारान के खिलाफ दर्ज पुलिस रिपोर्ट को रद्द करने के फैसले में वह शामिल हैं।

बेंच ने प्रासीक्यूशन की यह बात भी मंजूर नहीं की कि ऊपरी अदालत में अपील करने का उन्हें मौका दिया जाए तब तक आज का आर्डर रोका जाए। इस पर अमल न होने दिया जाए। जस्टिस सिवलीकर ने कहा कि तब्लीगियों और मस्जिदों के जिम्मेदारान के खिलाफ दर्ज पुलिस रिपोर्ट को रद्द करने के फैसले में वह शामिल हैं लेकिन फैसले में जस्टिस नलावडे के जरिए किए गए तमाम कमेण्ट्स से उन्हें इत्तेफाक नहीं है।

औरंगाबाद अदालत ने जो सख्त कमेण्ट्स किए।

बड़े पैमाने पर गैरजरूरी और झूटा प्रोपगण्डा करके मीडिया ने यह साबित करने की कोशिश की कि देश में कोरोना वायरस फैलाने का काम तब्लीगी जमात ने किया।शहरियत कानून (सीएए) की मुखालिफत करने की वजह से मुसलमानों को तब्लीगियों के बहाने डायरेक्ट वार्निंग दी गई थी।बेंच ने कहा कि हुकूमत एक ही कार्रवाई के लिए मुसलमानों और दूसरों के लिए अलग-अलग रवैय्या अख्तियार नहीं कर सकती अगर मस्जिदों में तब्लीगी रूके थे मंदिर और गुरूद्वारों में भी बड़ी तादाद में लोग लाकडाउन के दौरान फंसे थे।
विदेशी तब्लीगी अहमदनगर आए लाकडाउन में तमाम होटल और गेस्ट हाउस बंद हो गए थे इसलिए वह मस्जिदों में ठहरे यह जुर्म कैसे हो गया। मस्जिदों के जिम्मेदारान पर विदेशियों को छुपाने के झूटे इल्जाम लगाकर गिरफ्तार क्यों किया गया।जब भी कोई वबा (महामारी) या कुदरती आफत आती है तो सरकारें किसी न किसी को बलि का बकरा बनाने का काम करती है। कोरोना के लिए विदेशी तब्लीगियों को बलि का बकरा बनाया गया।महाराष्ट्र सरकार ने सियासी मजबूरी और दबाव में कार्रवाई कराई, मौके पर कार्रवाई करने वाले पुलिस वालों ने अपनी अक्ल का इस्तेमाल नहीं किया। संविद्दान से मिले अख्तियारात का भी इस्तेमाल पुलिस ने नहीं किया और बेगुनाहां को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया।पचासों सालों से तब्लीगी जमात समाज में काम कर रही है। कभी किसी का मजहब तब्दील कराने की कार्रवाई नहीं की यह जमात तो इंसानों को बेहतर इंसान बनाने का काम करती है।अदालत ने सरकार पर सख्त चोट करते हुए कहा कि अफसरान को अपनी गैर कानूनी कार्रवाइयों के लिए नदामत और पशेमानी (पश्चाताप) जाहिर करनी चाहिए। यह कार्रवाई मुसलमानों को यह एहसास कराने के लिए की गई कि देश में दूसरे मजहब के मानने वाले जो कुछ करते हैं अगर मुसलमानों ने भी किया तो सजा पाएंगे।तब्लीगियों के पैरोकार मजहर जहांगीरदार ने अदालत से कहा कि विदेशी जमाती भारत की सकाफत (संस्कृति), तहजीब, रिवायात मेहमाननवाजी और खान-पान देखने व समझने आते हैं। इस बार उन्हें जेल की मेहमाननवाजी दिखा दी गई। इससे विदेशों में भारत की तस्वीर (छवि) खराब हुई है।

रिपोर्ट-हिसाम सिद्दीकी,बहराइच

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