घरों में शहनाई की गूंज ना गूंजने से फूलों के मुरझाए चेहरे- फूल कारोबारियों का धंधा ठप

फूल

कोरोना काल में शहनाई की गूंज थमी तो फूलों के कारोबार से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष जुड़े 1000 से अधिक परिवारों के चेहरे मुरझा गए।

कोरोना काल में शहनाई की गूंज थमी तो फूलों के कारोबार से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष जुड़े 1000 से अधिक परिवारों के चेहरे मुरझा गए इस धंधे से जुड़े गोरखपुर से लेकर कोलकाता के करीब 300 कारीगर बेकार हो गए हैं शादियों के लिए लाखों रुपए खर्च कर तैयार हुए थे और इंफ्रास्ट्रक्चर खराब हो रहे हैं।

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गोरखपुर में फ्लावर डेकोरेशन वेडिंग इंडस्ट्री का हिस्सा है कुछ वर्ष पहले शादियों में फूलों की जरूरत से जय माल से इस चीज तक ही सीमित थी लेकिन समय के साथ कारोबार का ट्रेंड बदल गया है सिर्फ शादियां ही नहीं बर्थडे पार्टियां सालगिरह इंगेजमेंट से लेकर राजनीतिक कार्यक्रमों में बड़े और अब स्टेज की डिमांड बढ़ी है गोरखपुर के कारोबारियों के पास कौन से ₹5000000 तक का इंफ्रास्ट्रक्चर है फूल कारोबारी का कहना है कि बैंक से लोन लेकर फ्लावर डेकोरेटरो ने इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया है । उनकी फोजी फस गई है आए है नहीं यमाई भरने का संकट खड़ा हो गया है यह कहते हैं मैरिज पार्टियों के अलावा भी पारिवारिक और राजनीतिक कार्यक्रमों में फूलों की डिमांड रहती है सावन दीपावली दशहरा ऐसे त्यौहार है इसमें फूलों की खपत होती है।

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सावन गुजर गया लकी शिवालयों में सन्नाटा के कारण पूरा कारोबार बैठ गया फुल कारोबारी कहते हैं कि नवंबर और दिसंबर में जो वार्डन मिलेगी है वह औपचारिक वाले ही है लोगों की मांग सिर्फ स्टेज और जयमाला तक ही सीमित है पांच से ₹8000 तक खर्च करने को तैयार दिख रहे हैं गोरखपुर वाराणसी और लखनऊ के बाद फूलों के कारोबार का बड़ा केंद्र है वहां से नेपाल से लेकर बिहार तक मैरिज पार्टी की बुकिंग होती है एक शादी में फूलों का 30000 से लेकर 5000 तक का मिलता है फूल मिलाकर साल भर में करीब 50 करोड का कारोबार गोरखपुर और आसपास के जिलों में की जरूरत होती है कारोबारी कहते हैं कि वाराणसी के किसानों ने आदर नहीं मिलने से फूल के पौधों को उखाड़ फेंका है ऐसे में फूला भी रहे हैं विकास ही मांगे हैं आप सीजन में फूलों की माला 20 से ₹35 तक मिल जाती थी वर्तमान में यह 40 से ₹50 में बिक रही है शादियों से लेकर राजनीतिक कार्यक्रम में स्टेज सजाने के लिए कलाकार कोलकाता से आते हैं सीजन में स्थानीय कलाकार कोलकाता की कलाकारों का अपना खर्च पर बुलाते हैं और उनके ठहरने का इंतजाम करते हैं कारोबारी कहते हैं कि नए सीजन के लिए कलाकारों को नहीं बुलाया गया कुछ कलाकार लॉकडाउन में फंस गए हैं उन्हें घर मे से वेतन देना पड़ा । एक सीजन में सौ से डेढ़ सौ कलाकार आते हैं इन के सहयोग समें 200 से अधिक स्थानीय कलाकार लोग लगे रहते हैं।

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